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Monday, April 2, 2018

हमारा न्यारा खेल : राजनीति

यूँ तो क्रिकेट का चर्चा अब बारह मास हमारे चारों ओर रहता है फिर भी मैं समझता हूँ की राजनीती का खेल सबसे पॉपुलर है। आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी तक, छोटे व्यापारी से बड़े व्यापारी तक , स्कूल से लेकर घर और घर से दफ्तर तक कोई भी इससे अछूता नहीं है।  कभी चाहते हुए और कभी न चाहते हुए हम इसमें पड़ ही जाते हैं.  अब आप सोचेंगे की राजनीती खेल कैसे हो गयी? तो आइये इसके फॉर्मेट पे कुछ विचार करते हैं।
यह खेल स्वतंत्र रूप से भी खेला जा सकता है और अन्य खेलों के साथ समन्वित करके भी इसका आनंद लिया जा सकता है।  फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, कब्बडी  कुश्ती जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जा रहे मान्यता प्राप्त खेलों से यह किसी प्रकार भी कम नहीं है। पर कुछ भिन्नताएं हैं जो इस प्रकार हैं - फुटबॉल जैसे खेल का मैदान इसके लिए बहुत छोटा है।  आसमुद्रक्षिति इसके क्षेत्र में आ है। फुटबॉल खेलने जैसी शारीरिक शक्ति की भी इसमें कोई आवश्यकता नहीं है।  कृश-काय कमज़ोर प्राणी भी इसे पर्याप्त प्रवीणता से खेल सकता है। हॉकी जैसा अभ्यास ? नहीं-नहीं बिलकुल ज़रूरी नहीं है। बस दाँव लगाने की घात हो, गुर सीखने की बात हो, पदक ही नहीं ऊंचे से ऊंचा पद पाया जा सकता है। ग्यारह सदस्य टीम सरीखा  कुछ चुनने-बनाने का प्राविधान इस खेल में नहीं है। अगर अच्छा खिलाड़ी हो तो अकेला ही पूरी टीम को 'गली' में खड़े होकर आउट कर सकता है। ऐसा भी देखा गया है की गेंद बॉलर के हाथ में ही रही और बैट्समैन के विकेट उखड़ गए, स्टंप्स उड़ गए। कब्बडी की भांति विरोधी दल में 'कब्बडी-कब्बडी' करते हुए प्रवेश करना इसमें मूर्खता कहलाएगी।  पीछेसे जाइये और चुपके से काम करके निकल आइये। पर हाँ, कुश्ती की तरह बल तो नहीं पर छल से काम लेना पड़ता है। दिमाग़ी दाँव पेच की 'धोबीपाट' से प्रतिद्वंदी धूल चाटता दिखाई देता है। 
जिस प्रकार हर खेल में  नियमों का होना ज़रूरी है आप को जान कर हैरानी होगी की इस खेल का पहला नियम ही यही है कि इसमें कोई नियम नहीं है। खेल के निपुण खिलाड़ी ही नियम बनाने और अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन्हे बदलने वाले हैं। यदि चारों ओर भी विपक्षी टीमें हों तो भी एक कुशल खिलाड़ी चक्रव्यूह भेदन कर बाहर निकल मुस्कुराता दिखाई पड़ेगा। नियम से ज़्यादा 'संयम' से खेलने वाले इस खेल से अधिक लाभान्वित होते हैं। विजयी कोन होगा इसका निर्णय कोई रेफरी या एम्पायर नहीं बल्कि हार मान जाने वाला लेता है। आसान शब्दों में कहूं तोह कब्ज़ा सच्चा और झगड़ा झूठा... तो क्या साम दाम दंड भेद की सभी नीतियों से भरपूर इस अदभुत खेल को आप खेलना पसंद करेंगे.. 

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