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Sunday, April 29, 2018

Monday, April 2, 2018


एक ख़ाका है, एक खाँचा है
एक फलक है उसकी झलक है 
कुछ ख्वाईशें कुछ कोशिशें  
कुछ नाकाम सी कुछ काम की 
इक संकरी खिड़की है 
उसके पार एक बहुत बड़ा सा सच है 
अभी आँखों में है ,,,,,,
पर लगता है बाहर जाने पर 
मेरे पूरे अस्तित्व को डुबो लेगा 
प्रकाशमय कर देगा 
मेरी सम्पूर्ण काया को...... 

पर खिड़की छोटी और संकरी है 
बाहर निकलने की कोशिश में देह फंस जाती है 
कंधे चौखटों से टकरा जाते हैं 
लगता है वज़न घटाना होगा कुछ बोझ हटाना होगा 
कर रहा हूँ कोशिश..... 
रोज़ सुबह सूरज को हरता हूँ.... 
हर आघात को मात दे कर, उस पार के सच को पाना चाहता हूँ। 

मन के बुलबुले

हम अपने मन से अपनी सोच से अपनी क्रियाओं से अपने अस्तित्व का निर्माणबखान करते हैं। कई सारे मोटिवेशनल लेक्चर्स कोट्स भी पढ़ते रहते हैं। वो सब हमारे अपने बनाये मन मस्तिक्ष में आये हुए विचारों से संचालित होते रहते  हैं। ऐसा नहीं है की इसमें सच नहीं है की मन मिथ्या है -सच है  लेकिन कोई मिथक सत्य के काँधे के सहारे खड़ा रहता है।  सत्य की दूर तक जाती हुई 

हमारा न्यारा खेल : राजनीति

यूँ तो क्रिकेट का चर्चा अब बारह मास हमारे चारों ओर रहता है फिर भी मैं समझता हूँ की राजनीती का खेल सबसे पॉपुलर है। आम आदमी से लेकर ख़ास आदमी तक, छोटे व्यापारी से बड़े व्यापारी तक , स्कूल से लेकर घर और घर से दफ्तर तक कोई भी इससे अछूता नहीं है।  कभी चाहते हुए और कभी न चाहते हुए हम इसमें पड़ ही जाते हैं.  अब आप सोचेंगे की राजनीती खेल कैसे हो गयी? तो आइये इसके फॉर्मेट पे कुछ विचार करते हैं।
यह खेल स्वतंत्र रूप से भी खेला जा सकता है और अन्य खेलों के साथ समन्वित करके भी इसका आनंद लिया जा सकता है।  फुटबॉल, हॉकी, क्रिकेट, कब्बडी  कुश्ती जैसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेले जा रहे मान्यता प्राप्त खेलों से यह किसी प्रकार भी कम नहीं है। पर कुछ भिन्नताएं हैं जो इस प्रकार हैं - फुटबॉल जैसे खेल का मैदान इसके लिए बहुत छोटा है।  आसमुद्रक्षिति इसके क्षेत्र में आ है। फुटबॉल खेलने जैसी शारीरिक शक्ति की भी इसमें कोई आवश्यकता नहीं है।  कृश-काय कमज़ोर प्राणी भी इसे पर्याप्त प्रवीणता से खेल सकता है। हॉकी जैसा अभ्यास ? नहीं-नहीं बिलकुल ज़रूरी नहीं है। बस दाँव लगाने की घात हो, गुर सीखने की बात हो, पदक ही नहीं ऊंचे से ऊंचा पद पाया जा सकता है। ग्यारह सदस्य टीम सरीखा  कुछ चुनने-बनाने का प्राविधान इस खेल में नहीं है। अगर अच्छा खिलाड़ी हो तो अकेला ही पूरी टीम को 'गली' में खड़े होकर आउट कर सकता है। ऐसा भी देखा गया है की गेंद बॉलर के हाथ में ही रही और बैट्समैन के विकेट उखड़ गए, स्टंप्स उड़ गए। कब्बडी की भांति विरोधी दल में 'कब्बडी-कब्बडी' करते हुए प्रवेश करना इसमें मूर्खता कहलाएगी।  पीछेसे जाइये और चुपके से काम करके निकल आइये। पर हाँ, कुश्ती की तरह बल तो नहीं पर छल से काम लेना पड़ता है। दिमाग़ी दाँव पेच की 'धोबीपाट' से प्रतिद्वंदी धूल चाटता दिखाई देता है। 
जिस प्रकार हर खेल में  नियमों का होना ज़रूरी है आप को जान कर हैरानी होगी की इस खेल का पहला नियम ही यही है कि इसमें कोई नियम नहीं है। खेल के निपुण खिलाड़ी ही नियम बनाने और अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए इन्हे बदलने वाले हैं। यदि चारों ओर भी विपक्षी टीमें हों तो भी एक कुशल खिलाड़ी चक्रव्यूह भेदन कर बाहर निकल मुस्कुराता दिखाई पड़ेगा। नियम से ज़्यादा 'संयम' से खेलने वाले इस खेल से अधिक लाभान्वित होते हैं। विजयी कोन होगा इसका निर्णय कोई रेफरी या एम्पायर नहीं बल्कि हार मान जाने वाला लेता है। आसान शब्दों में कहूं तोह कब्ज़ा सच्चा और झगड़ा झूठा... तो क्या साम दाम दंड भेद की सभी नीतियों से भरपूर इस अदभुत खेल को आप खेलना पसंद करेंगे.. 

आदतन

'आदत' बुरी होती है
'आदत 'अच्छी होती है
अच्छा बनने की आदत 'अच्छी ' होती है
'बुरा  बनने की 'आदत ' बुरी होती है
पर में तो कहता हूँ -- 'आदत ' ही 'बुरी ' होती है
' अच्छा बनो ' सुनने की आदत पड़  जाए तो और भी बुरा होता है
"अच्छा बनने की संवेदना ही  समापत हो जाती है "
और आदत में सहजता की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है
रह जाती है तो सिर्फ "आदत"
तो आदतन - हम अच्छा सुनते हैं , अच्छा पढ़ते हैं , अच्छा लिखते हैं
लेकिन 'अच्छा' बनना 'आदत' में शुमार नहीं होता
'अच्छा' बनने की होड़ में। ...हर तरफ अच्छे  विचार की भरमार है
व्हाटएप्प, फेसबुक ,ट्विटर , हर  जगह -
अच्छा उपदेश है ,सन्देश है ,अच्छा भेष है,परिवेश है, आदेश है
मगर फिर भी - कुछ, अच्छा नहीं है
अभी भी हर तरफ द्वेष है कलेश है

सभी जागरूक हैं - पर 'आदतन' ,जाग के रुके हुए हैं
अंदर से दुखे हुए हैं
पर 'अच्छा ' होने की 'आदत ' बरक़रार है
अच्छा हो। .. आदत की शहादत हो जाये-----


डाईबेटीज़

ये मुँह से कुछ नहीं बोलते हैं
बस हवा में चीनी घोलते हैं। 

रोज़-सुबह-तड़के-सवेरे बाग़ में आ के दौड़ते हैं 
रोज़  वर्ज़िश करते हैं 
वज़न को भिगो कर वाष्प में घोलते हैं, हर खाने को नापते-तौलते हैं 
ये मुँह से कुछ नहीं बोलते हैं
बस हवा में चीनी घोलते हैं। 

मीठी चाय से परहेज़ है पर बर्फी के टुकड़े से भी न ग़ुरेज़ है 
फिर भी चीनी से कतराते हैं और करेला घोल के पी जाते हैं 
ये मुँह से कुछ नहीं बोलते हैं
बस हवा में चीनी घोलते हैं। 

ये ऊंचे बड़े पदों पे आसीन हैं 
बातों में कल की फ़िक्र है,  भविष्य का ज़िक्र है 
इनकी हर क्रिया - एक योजना है 
इसीलिए हर दो घंटे पे खाना खोजना है 
ये मुँह से कुछ नहीं बोलते हैं
बस हवा में चीनी घोलते हैं। 

इनके मस्तिष्क में बल है और पपीता ही इनका राष्ट्रीय फल है 
अक्सर अपने लहू में चीनी का माप टटोलते हैं  
ये मुँह से कुछ नहीं बोलते हैं
बस हवा में चीनी घोलते हैं। 

दूर से देखने में बहुत फिट लगते हैं , अपने आप में सिमटे लगते हैं 
शायद इसलिए.... ये मुँह से कुछ नहीं बोलते हैं 
बस हवा में चीनी घोलते हैं। 

अपनी उधेड़-बुन में रहने वालो. मान के मेरी ख़द को सम्भालो 
छोड़ भविष्य की फ़िक्र एक नज़र "आज " पर डालो 
पर तुम नहीं मानोगे , सिर्फ़ हल्का सा मुस्कुराओगे 
मुँह से कुछ नहीं बोलोगे
बस हवा में चीनी घोलोगे।




Sunday, April 1, 2018

यादों का भूत

सुना है... तुम्हारी मेमोरी बड़ी शार्प है
कहाँ रखते हो इतनी सब यादें
कैसे संजोते हो परत दर परत
कैसे याद रखते हो चेहरे
चेहरों के नाम, उनके काम , कहानियां
कैसे जोड़ते हो तुम अपनी बातों में उनसब के सन्दर्भ
जो बीत चुके हैं -भूतकाल हैं
भूत हो क्या ?
पर मानव जैसे दिखते हो
मुझसे मुखातिब हो- बातें कर रहे हो
बस अभी तो उठाया है तुमने चाय का प्याला
नहीं नहीं भूत तो कतई नहीं
फिर क्यों आज के झिल -मिल  को बोझिल करता है तुम्हारी यादों का तिमिर
जो हो चूका है ........ सो चुका है, उसे मत जगाओ
आज पे आरूढ़ हो के वर्तमान के हो जाओ। 

Lucknow : a short digital story about the changing facets of Lucknow https://youtu.be/k-k0tS0JdiU