एक ख़ाका है, एक खाँचा है
एक फलक है उसकी झलक है
एक फलक है उसकी झलक है
कुछ ख्वाईशें कुछ कोशिशें
कुछ नाकाम सी कुछ काम की
इक संकरी खिड़की है
उसके पार एक बहुत बड़ा सा सच है
अभी आँखों में है ,,,,,,
पर लगता है बाहर जाने पर
मेरे पूरे अस्तित्व को डुबो लेगा
प्रकाशमय कर देगा
मेरी सम्पूर्ण काया को......
पर खिड़की छोटी और संकरी है
बाहर निकलने की कोशिश में देह फंस जाती है
कंधे चौखटों से टकरा जाते हैं
लगता है वज़न घटाना होगा कुछ बोझ हटाना होगा
कर रहा हूँ कोशिश.....
रोज़ सुबह सूरज को हरता हूँ....
हर आघात को मात दे कर, उस पार के सच को पाना चाहता हूँ।

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