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Sunday, April 1, 2018

यादों का भूत

सुना है... तुम्हारी मेमोरी बड़ी शार्प है
कहाँ रखते हो इतनी सब यादें
कैसे संजोते हो परत दर परत
कैसे याद रखते हो चेहरे
चेहरों के नाम, उनके काम , कहानियां
कैसे जोड़ते हो तुम अपनी बातों में उनसब के सन्दर्भ
जो बीत चुके हैं -भूतकाल हैं
भूत हो क्या ?
पर मानव जैसे दिखते हो
मुझसे मुखातिब हो- बातें कर रहे हो
बस अभी तो उठाया है तुमने चाय का प्याला
नहीं नहीं भूत तो कतई नहीं
फिर क्यों आज के झिल -मिल  को बोझिल करता है तुम्हारी यादों का तिमिर
जो हो चूका है ........ सो चुका है, उसे मत जगाओ
आज पे आरूढ़ हो के वर्तमान के हो जाओ। 

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